मसीह में एक दूसरे के अंग बनो

मेरे प्रिय भाई-बहने आप सब कैसे हो? आशा करता हूँ कि आप सब प्रभु में अच्छे भले होंगे, क्योंकि वचन भी इस कि "प्रभु में सदा आनंदित रहो"

मेरे प्रियो मैं कुछ बातों को आपके सामने रखना चाहता हूँ जैसा कि निचे वचन में लिखा है कि मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग है...

मैं कहना ये चाहता हूँ कि जैसे हमारे देह में अलग-अलग अंग है और इनके काम करने का तरिका भी एक दूसरे से अलग है, पर ये अंग एक दूसरे के विरोध में नहीं है, और ये एक दूसरे की सहायता भी करते हैं...

लेकिन हम भी तो मसीह में एक दूसरे के अंग है, तो हमारा विचार काम करने का तरिका एक दूसरे से अलग हो सकते हैं, पर हमें बात-बात में किसी का विरोध नही करना चाहिये, हमें एक दूसरे की सह लेनी चाहिये, मदद करनी चाहिए, क्युन्कि हम मसीह में एक दूसरे के अंग कहलाते है,

हम अपने शरीर के अंगों से सीख सकते हैं, कि कैसे वो काम करता है बिना किसी का विरोध किये, और ये एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, और  सम्पूर्ण शरीर बनता है,

हम जब कभी भी किसी से बात करते हैं तो हमें इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जब बताने या समझाने की बात होती है तो सब की अलग-अलग राय, प्रतिक्रिया, होती है, अगर हम मसीहत के नज़र से देखे तो विचार, प्रतिक्रिया, राय लगभग 70% से 80% मेल खाते हैं,

लेकिन हम इसे नज़रअन्दाज़ कर देते हैं और उन 20 या 30% बातों को पकड़ लेते हैं, और वाद-विवाद करते हैं, जिससे एक दुसरे के प्रति मन मुटाव होता है,...

मेरे प्रियो इस बात का अव्श्य ध्यान रखे...



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